आधुनिक जीवविज्ञान | इसकी शाखाएँ | जैवरासायनिक आनुवांशिकी

आधुनिक जीव विज्ञान , इसकी शाखाएँ , जनन द्रव्य , एन्जाइम मत और जैव रासायनिक आनुवांशिकी , विभेदक जीन क्रियाशीलता , समस्थैतिकता

आधुनिक जीवविज्ञान ( Modern biology )

आधुनिक जीवविज्ञान में कुछ ऐसे संघठित ( Unifying ) सिध्दांतों को मान्यता दी गई हैं | जो सभी सजीवों पर एक समान रूप से लागू होते हैं |

1. संगठन का सिध्दांत ( Concept of organization )

संगठन के सिध्दांत के अनुसार जीवन से संबंधित समस्त प्रक्रिया रासायनिक एवं भौतिक सिध्दान्तों पर आधारित होती हैं | जैव क्रियाएँ भौतिक एवं रासायनिक संगठन पर निर्भर करती हैं जीव पदार्थों के घटकों पर नहीं |

2. जीवन्त जीवोत्पत्ति का सिध्दांत ( Concept of biogenesis )

जीव पदार्थ की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थ के संगठन में क्रमिक विकास से होती हैं | सजीवों कि उत्पत्ति सजीवों से ही होती हैं निर्जीवों से नहीं |

3. कोशिका सिध्दांत ( Cell theory )

कोशिका सिध्दांत के अनुसार नयी कोशिका का निर्माण पुरानी कोशिका से विभाजन के पश्चात होता हैं | कोशिका सिध्दांत श्लाइडेन एवं श्वान से दिया | जीवों का शरीर बहुकोशकीय होता हैं | जैसे – जन्तु , पादप , बैक्टीरिया , जीवाणु आदि | सभी कोशिकाओं की भौतिक संरचना , रासायनिक संगठन में एवं उपापचय में एक मूल समानता पायी जाती हैं | बहुकोशकीय जीव का जीवन समस्त कोशिकाओं की क्रियाओं का मेल होता हैं |

4. जैव विकास मत ( Theory of organic evolution )

वर्तमान में उपस्थित जीवों में किसी भी जीव की नई ( De novo ) रचना हुई हैं | इन जीवों की उत्पत्ति रचना में अपेक्षाकृत सरल पूर्वजों से हुई जो परिवर्तनों के पीढ़ी – दर – पीढ़ी संचय के फलस्वरूप होती हैं |

5. जीन मत ( Gene theory )

पीढ़ी – दर – पीढ़ी जनकों ( माता – पिता ) के लक्षण संतानों में पाए जाते हैं | क्योंकि जनकों के शरीर का प्रत्येक भाग अपने अतिसूक्ष्म प्रतिरूप ( नमूने या मॉडल्स ) बनाता हैं | जो अंडो ( Ova ) एवं शुक्राणुओं ( Sperm ) में सम्मलित होकर संतानों में जाते हैं |

जनन द्रव्य ( Germ plasm )

प्रवाह बीजमान ने दिया | इन्होंने कहा कि अंडे में नए जीव शरीर के भ्रूणीय परिवर्तन के समय प्रारंभ में ही ” जनन द्रव्य ” , ” देह द्रव्य ” ( Somatoplasm ) से अलग हो जाता हैं | जनन द्रव्य ही संतानों में जनकों के लक्षण प्रदर्शित करते हैं |

एंजाइम मत ( Enzyme theory )

प्रत्येक अभिक्रिया के पूर्ण होने के लिए कार्बनिक उत्प्रेरक का सक्रिय होना जरुरी होता हैं | क्योंकि प्रत्येक रासायनिक अभिक्रिया उत्प्रेरक की उपस्थित में पूर्ण होती हैं |

जैव रासायनिक आनुवांशिकी ( Biochemicle genetics )

जोर्ज बीडल और एडवर्ड टैटम के ” एक जीन \rightarrow एक एन्जाइम \rightarrow एक उपापचयी अभिक्रिया ” की परिकल्पना अनुसार जीन द्वारा प्रत्येक जीव के संरचनात्मक एवं क्रियात्मक लक्षण निर्धारित एवं नियंत्रित होते हैं | क्योंकि उपापचयी अभिक्रिया एंजाइम के द्वारा और एंजाइम का संश्लेषण एक विशेष जीन के द्वारा नियंत्रित होता हैं |

विभेदक जीन क्रियाशीलता ( Variable gene activity )

किसी भी बहुकोशकीय जीव का शरीर एक कोशिका ( भ्रूण ) से प्रारंभ होकर बार – बार समसूत्री विभाजन द्वारा बहुकोशकीय जीव की प्रत्येक कोशिका बनाता हैं | इन कोशिकाओं में बिलकुल समान प्रकार का जीन समूह उपस्थित होता हैं | अतः जीव शरीर की समस्त कोशिकाएँ क्रिया एवं रचना में समान होनी चाहिए | लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता | शरीर के विभिन्न अंग एवं अंगों के विभिन्न भाग असमान कोशिकाओं से बने होने के कारण रचना एवं कार्यिकी में भिन्न होते हैं | ऐसा इस कारण होता हैं क्योंकि विभिन्न कोशिकाओं में जीन समूह समान होता हैं | लेकिन उनमें जीन समूह के कुछ भाग ही सक्रिय होते हैं | तथा शेष निष्क्रिय होते हैं |

समस्थैतिकता ( Homeostasis )

प्रत्येक जीव अपने वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार अपने शरीर की कार्यिकी एवं उपापचय में उस वातावरण के अनुसार अनुकूल परिवर्तन उत्पन्न कर लेता हैं |

वाल्टर बी. कैनन के अनुसार , जीव द्वारा वातावरण के अनुसार अनुकूल परिवर्तन लाने की क्षमता को समस्थापना या समस्थैतिकता कहते हैं |

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